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संपति बांट लेना, माँ-बाप को ना बांटना!

श्रीगंगानगर।[गोविंद गोयल] बात पुरानी है, लेकिन हर वक्त नई। युवा लड़का घर से निकला। पीछे उसका पिता, जिसकी उम्र होगी लगभग 50 साल की। गली में दोनों के चेहरे बता रहे थे जैसे पिता बेटे को मना रहा हो। बेटे के चेहरे पर नाराजगी के भाव और पिता के चेहरे पर बेबसी के। कुछ क्षण के बाद बेटा बाइक लेकर बाजार की ओर चला गया और पिता अपना सा मुंह लेकर घर के अंदर। निश्चित रूप से घर के अंदर पिता ने युवा बेटे को कुछ कह दिया होगा। या कुछ दिलाने से इंकार नहीं तो ये कहा होगा कि अभी नहीं, फिर दिला देंगे। सुना है, इसे जनरेशन गैप कहते हैं। वो, जो एक दूसरे की समझ को, एक दूसरे को समझने नहीं देती। या दोनों एक दूसरे को समझते नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि पेरेंट्स को बढ़ते बच्चे की सोच को समझना चाहिए।

किन्तु क्या ये कहना सही नहीं कि बढ़ते बच्चे भी अपने पेरेंट्स को समझने की कोशिश करें। अर्थ की दृष्टि से उनके हालात जानें। उन्हें समझें। फिर आगे बढ़ें । शायद ही कोई पेरेंट्स होंगे जो अपने से अधिक बच्चों के बारे में ना सोचते हों। छिप छिपा कर उनके लिए नए नए सपने ना बुनतें हों। इन सपनों को हकीकत में बदलने के लिए अपने आप को ना झोंक देते हों। परंतु आज के बच्चों को बच्चों को ये जानने और समझने की फुरसत ही नहीं होती। इतना वक्त भी नहीं उनके पास कि वे इस दृष्टि से पेरेंट्स को देख सकें कि वे उनके लिए क्या क्या कर रहे हैं। और किस प्रकार से कर रहे हैं। बच्चे पेरेंट्स पर निगाह डालें तो उनको ज्ञान होगा कि मम्मी-पापा ने लंबे समय से अपने पर कुछ भी खर्च नहीं किया है।

कपड़े, जूते, चप्पल सहित वो सब, जो उनको चाहिए, सब का सब पुराना है। जबकि बच्चों के लिए नित नया सामान। ताकि बच्चे खुश रह सकें। उनको किसी वस्तु का अभाव ना हो। बच्चे इस बात को कहाँ जानते हैं कि जब वो चैन से सो रहे होते हैं तब माँ-बाप उनकी फिक्र में करवट बदल रहे होते हैं या फिर उनकी बेहतरी के लिए कोई योजना बना रहे होते हैं। ऐसा ना जाने कितनी ही रातों को होता है। बच्चों की सुकून भरी नींद से उन्हें खुशी मिलती है। वो अपनी रातों की नींद इस बच्चों के सुकून पर क़ुरबान करने में नहीं हिचकिचाते। बच्चे होते ही पेरेंट्स अपने आप को भूल कर बच्चों के लिए जीने लगते हैं। उनका मकसद एक ही रह जाता है, वो है बच्चों का कैरियर। उनकी शादी। इसी की जद्दोजहद में अपना जीवन खपा देने वाले पेरेंट्स को समझने की कोशिश कितने बच्चे करते हैं! जिनके पेरेंट्स होते हैं, वे कितने सौभाग्यशाली होते हैं, शायद इसका गुमान नहीं है बच्चों को। कोई उनके दिल को टटोल कर देखें, जिनके मम्मी-पापा में से कोई एक या दोनों नहीं रहे। मम्मी ना हो तो घर घर नहीं, ईंट पत्थर का ढांचा हो जाता है। पिता ना हो तो हौसला टूट जाता है। क्योंकि पिता बच्चों का खामोश हौसला है। और माँ! माँ जैसा तो कोई होता ही नहीं। लालन-पालन से लेकर बच्चे के कैरियर तक में केवल पैसा ही नहीं बल्कि माँ-बाप के दिन रात भी लगते हैं। उनके खुद के अहसास, सपने, दोनों का व्यक्तिगत समय भी लगता है। जो किसी गिनती में नहीं आता। लेकिन इसके बावजूद बच्चों को बनाने के लिए पेरेंट्स खुद के वजूद को मिटाते चले जाते हैं। ना! कोई अहसान नहीं। ये तो फर्ज है उनका। बिलकुल है। किन्तु क्या सारा फर्ज केवल पेरेंट्स का ही है! बच्चों का कोई फर्ज नहीं। वे अधिक कुछ नहीं तो इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने पेरेंट्स की दिनचर्या को देखे लें। वे क्या पहनते हैं। क्या खाते हैं। रोजी रोटी कमाने के बाद वे क्या करते हैं। उनके मूल भूत आवश्यकता क्या है। कैरियर बन जाने के बाद पेरेंट्स को एकांत नसीब ना हो। बच्चे संपति का बंटवारा करे लें, लेकिन अपने माता-पिता का ना करें, जो एक दूसरे का सहारा हैं। विदेश मेँ रहने वाले बच्चे अपने पेरेंट्स को केवल अपनी पत्नी की डिलिवरी के मौके के अलावा भी बुलाएँगे तो उन्हें और अच्छा लगेगा। ये सब कब और कौन करेगा, बच्चे जानें। [समाप्त]

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