हमारी प्रारंभिक संस्कृति में जीवन शैली को ज्यादा महत्व दिया गया था पर धीरे-धीरे हम अपनी प्राचीन जीवन शैली को भुलकर मॉडर्न जीवन शैली की ओर मुड़ गए। करण बड़ा स्पष्ट है कि हम जितना भौतिक विकास और ग्लैमर की ओर बढ़ते जाएंगे उतने ही हम अति व्यस्त हो जाएंगे पढ़ने में, लिखने में, पैसा कमाने में और आगे से आगे बढ़ने की होड मे हम व्यस्त हो जाते हैं नतीजन हम स्वयं पर ध्यान नहीं दे पाते जिससे कई प्रकार की बीमारियां हमारे आसपास फैल गई जिसके हम आये दिन शिकार होते हैं। पहले कि जिंदगी मेहनतकश थी तब इतने साधन नहीं थे जितने आजकल हमारे पास है इसी कारण हम इतने आलसी हो गए हैं कि घर से दूसरे मोहल्ले में जाने के लिए भी हमें गाड़ी की जरूरत पड़ती है। पहले कई किलोमीटर आदमी पैदल चलता था हर काम स्वयं करता था आजकल हर काम नोकर चाकर करते हैं। हमने शरीर को मट्ठा बना दिया नतीजन कई लोग तो एक दो मंजिल चढ़ाव भी नहीं चड पाते। घर बैठे सब सामान भी आने लग गया, टीवी, मोबाइल, गाने सुनने के भी सब साधन हो गए। जिंदगी में कुछ करने को बचा ही नहीं, घर की पुताई भी करना हो नौकर चाकर करते हैं। अधिकान्श नौकर चाकर पर निर्भर हो गए कई महिलाए घर की कामवाली बाई नहीं आती है तो वह बेचैन होती है। भौतिक और आर्थिक विकास में व्यस्त नहीं होकर हम अपनी स्वस्थता के पाए मजबूत करें तभी वास्तविक जिंदगी मे स्वस्थ रहेगे।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, पर्यावरणविद्)