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निर्माण विभाग और उसके निर्माण

जयपुर। (देवकिशन राजपुरोहित) दुनियाभर में सड़क भवन पुलों का निर्माण होता रहता है।यह कार्य निर्माण विभाग को कराना होता है।निर्माण की एक पूरी प्रक्रिया है।सर्वप्रथम निर्माण विभाग एक नियम बनाता है जिसमे भवन सड़क या पुल में क्या सामग्री लगेगी ,कितनी लगेगी।कितनी कीमत आएगी और कितना समय लगेगा।उस गाइड लाइन पुस्तक को बी,एस आर कहते हैं।
चूंकि यह कार्य सरकारी कर्मचारियों और विभागीय मजदूरों की कमी के चलते किसी न किसी ठेकेदार को ही देने पड़ते हैं।बाकायदा कार्य की निविदाएं प्रकाशित की जाती है।अनेक ठेकेदार अपनी निविदाएं सम्बंधित विभाग के अधिकारी को निर्धारित प्रपत्र में निर्धारित तिथि तक प्रस्तुत करते हैं।समय पर निविदाएं खोली जाती है।


निविदा उसी की स्वीकार की जाती है जो कम से कम दर प्रस्तुत करता है।इस समय बीएसआर से दुगुणी ढाई गुनी दर भरते हैं।इसका तर्क दिया जाता है बीएसआर दरें पुरानी है तथा बाजार भाव सभी वस्तुओं के बढ़े हुए हैं।
ठेकेदार के कार्य को जूनियर इंजीनियर,सहायक इंजीनियर, अधिशाषी अभियंता,क्वालिटी कंट्रोल अधिकारी समय समय पर चेक करते रहते हैं।उनके प्रमाण पत्र के बाद ही ठेकेदार को भुगतान होता है।
ठेकेदार कम से कम सामग्री लगा कर घटिया से घटिया निर्माण करता है और मुहमांगी दर वसूल करता है।
घटिया निर्माण के बिल कैसे पास हो जाते हैं यह विचारणीय प्रश्न है।नीचे से ऊपर तक कमीशन निर्धारित है जिसमे चपरासी से चीफ तक सबका हिस्सा है।चेक काटने वाले कैशियर को सौ रुपये पर 10 पैसे,जूनियर इंजीनियर को डेढ़ रुपया,सहायक अभियंता को तीन रुपये से लेकर 5 रुपये तक,अधिशासी अभियंता को 10 रुपये ओर ऊपर वालो के लिये 15 रुपये लिए जाते हैं।इस प्रकार कमीशन तो देना ही पड़ता है।ठेकेदार चाहे सही काम करे या गलत उसे तो यह ईमानदारी से देना ही पड़ता है।मतलब सब मिलकर 100 रुपये पर 35 से 40 रुपये बट जाते हैं।ऐसे कमीशनखोर अफसर ठेकेदार से सही काम नहीं करा सकते।ऐसा कमीशन खोरी का निर्माण कभी भी धूलिदूसरित तो होना ही है।
आज नित्य मीडिया बताता है अमुक पुल ठह गया,अमुक सरकारी भबन ढह गया।अमुक सड़क पहली बारिश में ही बह गई।जब तक कमीशनखोरी चलेगी कार्य ऐसा ही होगा।
सरकार को जहां करोड़ो का चूना लगता है वहीं आम जनता की जान खतरे में रहती है।आजादी के समय का जोधपुर का डाक बंगला आज भी सुदृढ है और पिछली गहलोत सरकार में निर्मित नए डाक बंगले की दो बार मरम्मत हो चुकी है।इसका एक ही कारण है अधिकारियों की बेईमानी ओर ठेकेदार द्वारा घटिया निर्माण।
मैं अब तक 29 देशों का भ्रमण कर चुका हूं।संयुक्त अरब अमीरात में ऐसे निर्माण के ढहने पर निर्माण करता को मृत्यु दंड का कानून है जबकि हमारे यहां उसी निर्माण के ढहने या टूट फुट होने पर पहले वाले ठेकेदार को ही दुबारा मरम्मत का ठेका दे दिया जाता है।इस कमीशनखोरी को सरकार के मंत्रियों का भरपूर साथ मिलता है और ठेकेदार चुनाव में नेताओं को जम कर चंदा देते हैं।
सरकार को ठेकेदारों से पहले ही बॉण्ड भरा कर भवन,सड़क,पुल आदि के निर्धारित अवधि से पहले क्षतिग्रस्त होने पर पुन: निर्माण कराने और जान माल की हानि होने पर उसकी भरपाई करने की शर्त होनी ही चाहिये।यो ऐसे ठेकेदारों को ब्लैक लिस्ट करने के बजाय उनके खिलाफ संगीन धाराओं में मामले चला कर कठोर सजा दिलानी चाहिये।


नागौर में कई साल पहले एक बी के व्यास अधिशाषी अधिकारी थे।वे ईमानदार और कर्तव्य परायण अधिकारी थे।न खाते थे न खाने देते थे।सड़क को जब चाहते जहाँ चाहते खुद खुदवा कर देखते ओर कई बार तो सड़क का पुनर्निर्माण भी कराते थे।जो इंजीनियर निर्माण की सही रिपोर्ट देते और सही नही होती तो वे उनको दंडित भी कराते थे।
ऐसे अधिकारी और ठेकेदार देशद्रोही की श्रेणी में जिस दिन रखे जाएंगे तभी निर्माण का स्तर सुधरेगा।इतना ही नहीं ऐसे अधिकारियों ओर ठेकेदारों की नामी बेनामी सम्पतियों पर अचानक छपे मारी की जाएगी तो पता चलेगा कि वस्तुस्थिति क्या है।जब ठेकेदारों के नेताओं से रसूख खोजेंगे तो अधिकतर भृष्ट ठेकेदार नेताओं के भाई ,बेटे,साला आदि मिलेंगे।

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