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‘नयी कविता के आत्मसंघर्षी कवि हैं मुक्तिबोध’: तिवारी


ओम एक्सप्रेस न्यूज बीकानेर। ”मुक्तिबोध अपने युग के प्रश्नों से लड़कर महान बने। मुक्तिबोध प्रगतिशील आन्दोलन की देन है। वे मार्क्सवाद को सुविधाजनक नहीं अपितु उसे पूर्ण बनाना चाहते थे।” ये उद्गार व्यक्त किये प्रबुद्ध एवं प्रखर आलोचक प्रो. अजय तिवारी ने। वे साहित्य, कला एवं सांस्कृतिक चेतना का न्यास-समवेत द्वारा हिंदी साहित्य की मानवीय चेतना के शिखर रचनाधर्मी गजानन माधव मुक्तिबोध की जन्मशती के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे। इस आयोजन के संबंध में जानकारी देते हुए समवेत के सचिव श्रीलाल जोशी ने बताया कि महाराजा नरेन्द्र सिंह ऑडिटोरियम, बीकानेर में आयोजित इस संगोष्ठी में देश के शीर्षस्थ विद्वानों ने प्रतिभागिता निभाई।

इस मौके पर प्रो. अजय तिवारी ने कहा कि ”मुक्तिबोध निजता को कविता की महत्वपूर्ण जरूरत मानते थे। उनकी कविताएं साम्राज्यवाद का हर स्तर पर विरोध करती नजर आती है। मुक्तिबोध नयी कविता के आत्म संघर्षी कवि हैं। मुक्तिबोध अपने युग की महान प्रतिभा थे। मुक्तिबोध प्रगतिशील विचारधारा की देन है।” उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध को समर्पित इस आयोजन में मुक्तिबोध की समग्र रचना दृष्टि के संदर्भ में, मुक्तिबोध: समग्र मूल्यांकन-समय की समझ’ विषय पर गंभीर चर्चा हुई। इस विशिष्ट बौद्धिक आयोजन में चर्चा में भाग लेते हुए प्रख्यात आलोचक डॉ. जीवन सिह (अलवर) ने कहा कि ”मुक्तिबोध सत्ता में छिपे छल को उजागर किया। सत्ता अपने आप में ही एक फासिस्ट विचार को दबाये रखती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उठ रहे खतरे को वर्षों पहले मुक्तिबोध ने पहचान लिया था।” डॉ. जीवन सिंह ने कहा कि ”मुक्तिबोध ने सदैव मध्यमवर्ग को अपनी कविताओ ंके केन्द्र में रखा। उनके पूरे साहित्य में हम मध्यमवर्ग को सकारात्मक रूप से शिक्षित करते हुए अनुभूत कर सकते हैं। दरिद्रता के संकट और प्रलोभन के बावजूद मुक्तिबोध ने अपनी विचारधारा के साथ कभी समझौता नहीं किया। मुक्तिबोध ने मन की कविताएं लिखीं। अपने दौर की गहराई को जिस तरह मुक्तिबोध ने समझा, उतना अन्य कवि नहीं समझ पाये। मुक्तिबोध में कारण व कार्य की अभिव्यक्ति की ताकत थी।” इस अवसर पर प्रख्यात-समादृत कवि श्री राजेश जोशी (भोपाल) ने मुक्तिबोध की रचनाओं में मानवीय चेतना के विकास की प्रक्रिया व मूल्य की पड़ताल पर अपने विचार व्यक्त किये। जोशी ने कहा कि ”मुक्तिबोध की कविताओं का शिल्प व स्थापत्य खड़ी चट्टान के समान है। कविता हो या उनका गद्य, ऐसा प्रतीत होता है कि ये एक दूसरे में गूंथी हुई हैं। मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे। उन्होंने छायावाद से लेकर प्रगतिवाद, प्रयोगवाद तथा नयी कविता सभी में सशक्त उपस्थिति दी किंतु धारा उनकी अपनी अलहदा रही। नेहरू युग में फेंटेेसी का काव्य में प्रयोग करने वाले मुक्तिबोध एक मात्र कवि थे।” इस अवसर पर जोशी ने मुक्तिबोध के पुत्र रमेश मुक्तिबोध द्वारा सुनाये गये संस्मरणों को भी साझा किया। समवेत के अध्यक्ष तथा इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ समालोचक एवं लोक संस्कृति मर्मज्ञ डॉ. श्रीलाल मोहता ने तीनों विद्वानों द्वारा प्रस्तुत विचारों से मुक्तिबोध के साहित्य के प्रति समग्र हिंदी साहित्य में उनके अवदान के महत्व को बल मिला है। इस कार्यक्रम की सार्थकता इसी में निहित है। मुक्तिबोध के अवसान से हमने ऐसे कवि को खो दिया जो राष्ट्र के बारे में समाज के बारे में तथा जीवन मूल्यों के बारे में इतनी सटीकता के साथ समझा सकते थे। इससे पूर्व कार्यक्रम संयोजक संजय पुरोहित ने मुक्तिबोध का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए इस आयोजन का मन्तव्य प्रस्तुत किया। साहित्यानुरागी अविनाश व्यास ने इस आयोजन का विचार बीज का परिचय तथा विषय प्रवर्तन करते हुए मुक्तिबोध जैसे क्रांतिकारी कवि की जन्मशती पर इस प्रकार के आयोजन से शहर की लेखनी को ऊर्जा मिलेगी। वरिष्ठ कवि सरल विशारद ने आभार ज्ञापित करते हुए कहा कि ”मुक्तिबोध का साहित्य अपने दौर का मजबूत दस्तावेज है। समवेत द्वारा आहूत इस आयोजन से मुक्तिबोध के प्रति और जिज्ञासा उत्पन्न होगी एवं अधिक लोग उन्हे पढऩे, समझने, जानने का प्रयास करेंगे।” इस अवसर पर श्री अनिरूद्ध उमट, श्री श्रीहर्ष, श्री दीपचंद सांखला, श्री भवानीशंकर व्यास विनोद, श्री अशोक जोशी, श्री शांतिप्रकाश बिस्सा, श्री शमीम बीकानेरी, श्री जाकिर अदीब, श्री ओमप्रकाश सुथार, श्री बुलाकी शर्मा, डॉ. बृजरतन जोशी, श्री बीएल नवीन, श्री नगेन्द्र किराडू, श्री इसरार हसन कादरी, श्री प्रमोद कुमार चमोली, श्री विजयशंकर आचार्य, श्रीमती रचना शेखावत, श्रीमती मोनिका गौड़, श्री गौरीशंकर प्रजापत, श्री मोहम्मद फारूख, श्री विप्लव व्यास, श्री राजेन्द्र जोशी सहित बीकानेर के विभिन्न वर्गों के गणमान्यजन आदि उपस्थित थे।

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