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सोलहवीं शताब्दी के ग्रंथ “द्वादशारनयचक्र” का लोकार्पण


ओम एक्सप्रेस न्यूज बीकानेर। रांगडी चौक स्थित तपागच्छ पौषधशाला में पंन्यास प्रवर पुण्डरीकरत्न विजय जी महाराज साहेब की निश्रा में विश्वविख्यात आगमप्रज्ञ मुनि जम्बूविजय जी की पुण्यतिथि मंगलवार को मनाई गई।
इस अवसर पर मुनि जम्बूविजय जी के तीस वर्षीय अथक प्रयास द्वारा पुनरुद्वारित पाँचवी सदी के बारह दर्शनो पर आधारित ग्रंथ “द्वादशारनयचक्र” के हिन्दी अनुवाद को डॉ सुषमा सिंघवी ने गुरचरणों में अर्पण किया ।पद्मभूषण डॉ. देवेंद्रराज मेहता की प्रेरणा से प्राकृत भारती अकादमी जयपुर द्वारा प्रकाशित होने वाले इस ग्रंथ का संपादन एवं अनुवाद डॉ सुषमा सिंघवी ने किया है। इस अवसर पर मुनि पुण्यरत्न चंद्र जी,प्रवचनकार मुनि मनितप्रभ सागर ,मुनि महाशालविजय जी ने गुणानुवाद करते हुवे जम्बूविजय जी के विशाल व्यक्तित्व और निस्पृहता का बखान किया।

प्रोफ़ेसर सुमेरचंद जैन ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुवे कहा की इस ग्रंथ की प्रस्तावना मात्र पढऩे से ही इसकी सर्वोचता का पता लग जाता है ।डा सुषमा सिंघवी ने अपने व्याख्यान में इस जटिल ग्रंथ की विशेषताओं को बताते हुवे मुनि जम्बूविजय जी की अद्वितीय विद्वता को अतुलनीय बताया।उन्होंने आज के समय में विश्व में अपरिग्रह की नितांत आवश्यकता बताई।लीलमचंद सिपानी, विजय कोचर,विजय जी बाँठिया,रिखबचंद सिरोहिया, श्रीमती शांतिदेवी ने अतिथियों का शाल एवं श्रीफल से स्वागत किया।कार्यक्रम का संचालन विकास सिरोहिया ने किया।

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