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संत दुलाराम कुलरिया की तृतीय पुण्यतिथि पर भजन सध्या का आयोजन

नोखा। संत दुलाराम ने जीवनभर दान देने का काम किया, किसी से कुछ चाहा तो आशीष और दुआएं गौसेवक संत दुलाराम कुलरिया की तृतीय पुण्यतिथि उनके पैतृक गांव मूलवास-सीलवा में यादगार तरीके से मनाई गई। प्रदेशभर से पहुंचे उनके अनुयायियों ने उन्हें तैलचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। इस दौरान आयोजित हरि नाम सत्संग कार्यक्रम में प्रसिद्ध भजन गायक अनूप जलोटा के साथ अन्य कलाकारों ने भजनों की प्रस्तुतियां दी। रात को शुरू हुए सत्संग से मूलवास की गलियों में मानों भजनों की सरिता बह गई। मीठे भजनों की स्वर लहरियों ने हर किसी को आनंदित किया। संत दुलाराम कुलरिया के पुत्र भंवर, नरसी व पृूनम कुलरिया आए हुए सभी लोगों का स्वागत कर रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके पिताजी ने जीवनभर गौ सेवा की। आम लोगों की मदद में वे कभी पीछे नहीं रहे।

उन्होंने हमें भी यही सीख दी कि जितना हो सके, उतना दान करो। कर्म करते जाओ और दान के मार्ग पर चलते हुए प्रभु को याद करो, तो सफलता मिलती रहेगी। आज वे हमारे बीच नहीं है। मगर, उनकी एक-एक सीख हमारे लिए हर पल अंधेरे में प्रकाश की किरण की तरह काम आ रही है। इस दौरान बसों व अन्य संसाधनों से मूलवास पहुंचे उनके अनुयायियों ने संत दुलाराम को क्षेत्र की एक ऐसी विभूति बताया जिसने हमेशा देने पर विश्वास किया। लेना, उनकी प्रवृत्ति में था तो केवल आशीष। आशिष लेने के अलावा अपने दर पर आए हर व्यक्ति से उन्होंने कुछ नहीं चाहा। महंत क्षमारामजी ने उन्हें पुण्यआत्मा बताया।

भजन सम्राट अनूप जलोटा गुरुवार को नोखा तहसील के मूलवास-सीलवा में पहुंचे। अपने भजनों से हजारों श्रद्धालुओं को भक्तिरस का आनंद दिलवाने वाले जलोटा ने बताया कि वे जल्द ही नए भजन लेकर आए रहे हैं। अच्युत केशवं, स्वामी नारायणं जैसे वर्तमाल में प्रचलित भजन के साथ ही भजते-भजते आज अचानक मेरी बंशी टूट गई भजन श्रोताओं को नई ऊर्जा देगा। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि गीता के सात सौ श्लोकों का उन्होंने उर्दू में अनुवाद किया है। उन्हें 1750 उर्दू श्लोक में बदलने का काम कर चुके हैं। अब उन्हें अपनी आवाज में दो महीने बाद लांच करेंगे। जलोटा ने बताया कि उनका बीकानेर से पिछले 40 वर्षों से जुड़ाव है। इस धर्मनगरी में वे समय-समय पर लोगों के बुलावे पर आते रहे हैं।(PB)

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