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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मानगढ़, राजस्थान की यात्रा प्रदेश की ही नहीं, कांग्रेस की राजनीति को भी गर्मा गयी है। पीएम की सभा में गुजरात, मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान के सीएम भी शामिल हुए। आदिवासी बहुल इस इलाके के आयोजन ने पीएम ने तीनों राज्यों की आदिवासी बहुल सीटों को साधने की कोशिश की थी। मगर ये सभा तो पूरे देश की राजनीति पर असर डालने वाली साबित होने लग गई है।
इस सभा में गहलोत अपने चार खास मंत्रियों के साथ शामिल हुए। बात यहीं तक नहीं रुकी। मोदी से पहले हुए अपने संबोधन में गहलोत ने जहां पंडित नेहरू और गांधी की तारीफ की तथा कहा कि मोदी को पूरी दुनिया में सम्मान इसलिए मिल रहा है, क्योंकि वो उस देश के नेता है जो गांधी का देश है। जहां अब भी लोकतंत्र जिंदा है।
बात यहीं तक होती तो कुछ नहीं था, उन्होंने अपने संबोधन में मोदी को विश्व स्तर का नेता भी बता दिया। बड़ी बात ये है कि राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के जो ध्येय बता रहे हैं, उसमें एक ध्येय खतरे में पड़े देश के लोकतंत्र को बचाना भी है। कांग्रेस लगातार पीएम पर ये आरोप लगा रही है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है, संविधान खतरे में है। मगर गहलोत ने तो लोकतंत्र मजबूत है, ये कहा।
गहलोत के संबोधन में मोदी पर तंज था तो कुछ तारीफ भी थी। सामान्य लोकाचार से देखें तो गैर राजनीतिक सभा का उनका ये भाषण गलत तो नहीं लगता। मगर बाद में हुए पीएम मोदी के संबोधन ने इस भाषण के अर्थ और मायने भी बदल दिए। उसी कारण देश की सियासत में एक नया भूकम्प सा आ गया, खासकर कांग्रेस में। गहलोत के भाषण के नए अर्थ निकलने लगे।
पीएम मोदी ने गहलोत को वरिष्ठ नेता कहते हुए उनकी तारीफ की। राजनेता के रूप में उनके कामों की तारीफ की। बस, यहीं से राजनीतिक कयासों की बातें शुरू हुई। राजस्थान में गहलोत और पायलट की टकराहट पिछले कुछ दिनों से फिर गर्मा गयी है। उसके चलते पायलट ने गहलोत की जो तारीफ की उस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मोदी ने एक बार गुलाम नबी आजाद की भी तारीफ की थी, उसके बाद क्या हुआ सभी जानते हैं। सभी को मालूम है कि गुलाम नबी कांग्रेस छोड़ गये और कश्मीर में अपना अलग राजनीतिक दल बना लिया।
पायलट का ये गहलोत पर तीखा हमला था, जिसकी उम्मीद इस समय कोई नहीं कर रहा था। क्योंकि कांग्रेस में नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बना है और हिमाचल, गुजरात के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। बयान था ही ऐसा की उसकी धमक दूर तक जाना तय था। राजनीति के जानकार और कांग्रेस के नेता, गहलोत और पायलट के बयानों के अपने अपने अर्थ निकाल रहे हैं। राजनीति में सारा खेल परसेप्शन पर ही तो टिका रहता है। ये कोई नई बात तो नहीं।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गहलोत ने राज्य की राजनीति से उनके सामने आ रही परेशानियों का आलाकमान को ईशारा किया है और एक बात कही है। वहीं पायलट के बयान पर राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अब वो भी आलाकमान को ये कहना चाह रहे हैं कि बहुत धैर्य हो गया, अब कोई निर्णय होना चाहिए। दोनों नेताओं के बयान एक तरह से कांग्रेस आलाकमान के लिए अलार्म है, ये हर कोई मान रहा है। लगता भी यही है।
बात यहीं तक की होती तो सम्भल जाती मगर मंत्रियों के बयानों ने ज्यादा राजनीतिक हलचल पैदा कर दी।
अपने बेलाग बयानों से चर्चा में रहने वाले राजेन्द्र सिंह गुडा ने कहा कि आलाकमान ने इस मसले पर दो दिन में निर्णय का कहा था, मगर महीना हो गया। अब निर्णय होना चाहिए और दिल्ली में विधायक दल की बैठक बुलानी चाहिए। गुडा ने गहलोत खेमे के मंत्रियों शांति धारीवाल व महेश जोशी के साथ आरटीडीसी चेयरमेन धर्मेंद्र राठौड़ पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की भी मांग कर डाली। जिसका अपने बयान में युवा विधायक दिव्या मदेरणा ने समर्थन भी कर दिया। महेश जोशी ने भी अपना आईना देखने की सलाह बयान देने वालों को दे दी। खुद गहलोत ने भी इस तरह के बयान न देने की आलाकमान की सलाह याद कराई। इसी बीच मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने अफसरों के खिलाफ मोर्चा खोल कह दिया कि राज में वे हावी है। अब तो दोनों गुटों के विधायक भी एक दूसरे पर बयान देने से नहीं चूक रहे हैं। कांग्रेस के लिए राजस्थान ने फिर से चिंता खड़ी कर दी है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस बार की टकराहट किसी निर्णय को पायेगी, ये तय लगता है।


- मधु आचार्य ‘ आशावादी ‘
वरिष्ठ पत्रकार
