यह दो जगह ऐसी है जहां लोगों का अतीविश्वास है। जब भी कोई विवाद होता है तो सबसे पहले यह कहते कि तेरी थाने में रिपोर्ट लिखा देंगे, जरा पुलिस बुला तो। अन्य मामले में कहते हैं कि आई विल सी यू इन कोर्ट में तुझे कोर्ट में देखूंगा। यदि यह दो जगह बिल्कुल ईमानदारी से काम हो तो आप कह सकते हो कि पृथ्वी पर रामराज है स्वर्ग का वातावरण महसूस होगा। यहां यह भी जानना जरूरी है कि इन दोनों पर कितना काम करने का भार है और जरूरत से ज्यादा भार होने पर क्या आप अच्छे काम की उम्मीद कर सकते हैं कि समय पर काम होगा उम्दा काम होगा, बिल्कुल नहीं। जिस हिसाब से कोर्ट में केस आते हैं उनकी संख्या के अनुरूप हमारे पास कोर्ट नहीं है जजेस की कमी है और यही हालत पुलिस थाने पर है पुलिस के जुम्मे सिक्योरिटी और शांति के काम के अलावा हिंदुस्तान में कहीं घासलेट कंट्रोल का भी काम है तो भी वह पुलिस वाले को खड़ा करते हैं। कोई भी बड़ा अधिकारी एयरपोर्ट पर या कहीं आएगा जाएगा तो उसको रिसीव करने और छोड़ने पुलिस वाले जाएंगे। चालान बनाने का काम भी सौंप रखा ट्रैफिक का काम भी सौंप रखा। अब अपनी इमानदारी से यदि वह ऑफिसर काम करें तो 36 घंटे का काम आपने 8 घंटे की ड्यूटी में सोप रखा कैसे चलेगा। कहीं ना कहीं तो यह जानना होगा कि हम किसी व्यक्ति से कितनी कैपेसिटी की उम्मीद करते हैं। और इतने सारी जिम्मेदारी देने के बाद उससे ईमानदारी की कैसे उम्मीद करें। जबकि हम सब जानते हैं कि हर बड़े आदमी की व्यवस्था में इन लोगों को अपने पास से खर्च करना पड़ता है। सिस्टम के सब जिम्मेदार यह जानते हैं लेकिन बोले कौन क्योंकि वह खुद इस करप्ट सिस्टम में जाने अनजाने हिस्सेदार हो जाते हैं।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, पर्यावरणविद्)

