-सत्ता परिवर्तन के लिए जन आंदोलन और जेपी चाहिए


देश के आम चुनाव 2024 में होने वाले हैं। लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियां चाहती है कि मोदी सरकार को उखाड़ फेंके। इसके लिए विपक्षी पार्टियां पटना में बैठक से शुरुआत कर चुकी है। विपक्षी पार्टियां एक बैठक और करेगी फिर सीटों का बँटवारा होगा । यक्ष सवाल हमारे सामने आता है कि क्या विपक्षी पार्टियों के एक होने से उन्हें मोदी के खिलाफ जनादेश मिल जाएगा ? शायद राजनीतिक पार्टियां भूल रही है। 1977 से पूर्व देश में इंदिरा सरकार के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन प्रारंभ किया गया । इंदिरा सरकार के खिलाफ जन जागरण हुआ, जेपी आंदोलन में देश का युवा राजनीति से जुड़ा , जो युवा देश की राजनीति में उस समय आया वह सभी इंदिरा जी के खिलाफ मन बनाकर ही आया , तब तक ना तो विपक्षी पार्टियां एक हुई थी और ना ही चुनावी रणनीति बनी थी। राजनीतिक पार्टियां यह भूल रही है कि केवल हमारे एक होने से मोदी सरकार के खिलाफ जनादेश उनके पक्ष में आने वाला नहीं है। जिस समय देश में राजनीतिक पार्टियां एक हुई थी उस समय जनता पार्टी का गठन हुआ था, कांग्रेस के खिलाफ जनता पार्टी ने चुनाव लड़ा था उस आम चुनाव में जनता पार्टी के बैनर तले देश में राजनीतिक अनुशासन भी बना, राजनीतिक दल एक हुआ था। और वही दल चुनाव लड़ा था। ऐसी स्थिति में आज विपक्ष हमारे देश में नहीं है । यहां यह भी सोचना होगा कि इस समय ना तो मोदी सरकार के खिलाफ देश में जन आंदोलन है और ना ही कोई जेपी है और तो और ना ही मोदी सरकार के खिलाफ एक होकर के चुनाव लड़ने की कोई कार्य योजना । वैसे हालात पैदा किया जाना विपक्षी पार्टियों के बस की बात नहीं है। जिसका नतीजा पहली ही बैठक में केजरीवाल के बेमेल सूर हमारे सामने आए तो केसीआर आए नहीं ।
विपक्षी पार्टियों को यह भी समझ लेना चाहिए कि केवल बैठक मात्र से जनता मोदी सरकार के खिलाफ कैसे होगी। कांग्रेस के अलावा लगभग सभी पार्टियां क्षेत्रीय दल के रूप में अपना प्रभाव रखती है, कांग्रेस पूरे देश में पहचान रखती है। क्या क्षेत्रीय दल कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में अपनी सीटें दे देंगे, अगर अधिक सीटें नहीं देंगे तो फिर कांग्रेस लोकसभा में कैसे जीतेगी ? कितना ही सीटों का बंटवारा हो जाए नुकसान कांग्रेस को होना है।
विपक्षी पार्टियां एक होकर लोकसभा चुनाव में उतरने का ख्वाब देख रही है जो संभव नहीं है। विपक्ष की एकता का राग वही नेता अलाप रहे हैं जो प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे है ।
कांग्रेस को यह भी स्मरण करना होगा कि पी. वी. नरसिंहराव ने जो पहल उत्तर प्रदेश में जिस समय पहला गठबंधन किया था और खुद 85 सीटों पर सिमट कर विधानसभा चुनाव लड़ा था, उसके बाद उत्तर प्रदेश में सरकार तो बनना दूर, पार्टी के कार्यकर्ता तक छिटकते चले गए और हालात अभी तक यह है कि कांग्रेस संगठन में पदाधिकारी बनने वाले मजबूत आदमी तक नहीं है। कांग्रेस जैसी पार्टी के उम्मीदवार जब चुनाव में खड़े नहीं होते हैं तो कार्यकर्ता कांग्रेस को छोड़ते जाते हैं। और यही स्थिति आज हम उत्तर प्रदेश में देख सकते हैं कि कांग्रेस के पास कार्यकर्ता तक नहीं है। ऐसे में कांग्रेस अगर विपक्षी पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है तो उसका भविष्य क्या होगा। यह कांग्रेस को अभी एहसास नहीं है । यह बात भी सही है कि 1977 के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार तीन साल से अधिक नहीं टिक पाई। विपक्ष की सरकार बन भी जाती है तो उसकी उम्र कितनी होगी यह भविष्य के गर्भ में नहीं है बल्कि सामने दिखाई दे रहा है। विपक्षी पार्टियां हिमाचल प्रदेश और कर्नाटका के बाद यह मान रहे हैं कि वहां कांग्रेस की स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन लड़ाई अब लोकसभा चुनाव की है। विपक्ष को पिछले लोकसभा चुनाव से सबक लेना चाहिए जब राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली।
बीजेपी और क्षेत्रीय पार्टियां इस समय देश में हावी है। क्षेत्रीय पार्टियां जहां नहीं है वहां भारतीय जनता पार्टी मुखर है जिस तरह राजस्थान और उत्तर प्रदेश में हम देख सकते राजस्थान की तो हालात यह है कि कांग्रेस की सरकार बनने के बाद हुए लोकसभा चुनाव में एक भी सीट कांग्रेस को नहीं मिली।
उस समय सीधी टक्कर कांग्रेस और बीजेपी में थी ऐसे में विपक्षी पार्टियां एक होकर के क्या करेगी।
एक बात स्पष्ट दिखाई दे रही है कि इस विपक्षी एकता में क्षेत्रीय दलों को ही लाभ होने वाला है, उनकी सीटें बढ़ेगी। कांग्रेस को कोई भी दल अपने-अपने क्षेत्र में बहुत अधिक सीटें देने की स्थिति में नहीं रहेगी। और कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियाँ जितनी सीट दे देती है तो क्या कांग्रेस वह सभी सीटें जीत पायेंगी। हम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश की बात करें तो वहां कांग्रेस की हालात लोकसभा चुनाव के लिए कोई अच्छी नहीं है। सवाल खड़ा होता है कि विपक्ष मोदी सरकार को उखाड़ना चाहता है तो उसे अभी एकता का परिचय देना होगा, पूरे देश में आंदोलन करना होगा, वह सामूहिक आंदोलन हो, और मोदी सरकार के खिलाफ जन जागरण के माध्यम से मतदाताओं को आक्रोशित करने में कितनी सफलता विपक्ष को मिल सकती है।
आज हालात यह है कि विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ किसी भी एक स्थान पर एकजुट होकर विरोध का बिगुल नहीं बजा रहा । बैठकों से मतदाता इनके पक्ष में रुझान बना सके यह कहना बहुत मुश्किल है।
उस समय मोरारजी देसाई, चंद्रशेखर, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेई सहित समूचे विपक्ष ने एक होकर ऐसे हालात बना दिए इंदिरा जी को देश में आपातकाल घोषित करना पड़ा। जेले नेताओं से भर गई तब कहीं इंदिरा जी को विपक्ष सत्ता से हटाने में कामयाब हो पाया। उस समय के हालात क्या आज का विपक्ष बना सकता है।
मोदी सरकार को आपातकाल लगाने को मजबूर कर सकता है? मोदी सरकार के खिलाफ बिगुल बैठकों से नहीं बजेगा । ऐसी स्थितियाँ वर्तमान विपक्षी पार्टियों के बूते में दिखाई नहीं दे रही है। इसलिए अगर बैठकर कामयाब भी हो जाती है और सीटों का बंटवारा भी हो जाता है तो भी सत्ता परिवर्तन होना मुश्किल लगता है।
-राजेन्द्र जोशी
हिन्दी – राजस्थानी भाषा के
वरिष्ठ साहित्यकार है।
कवि-कथाकार
बीकानेर


