

— 16 मई 2021
मित्रों और संबंधियों तथा शुभ चिंतकों।
अभी अभी मेरी एक भुजा।छोटे भाई लक्ष्मण जिसकी जन्म तिथि 18 जून 1955 तदनुसार आषाढ़ शुक्ला 2012 मंगलवार,जो मुझसे 10 साल छोटा था ।
उसका अध्ययन बाखासर बाड़मेर और रामसर बाड़मेर में जहा पर मै अध्यापक था मेरे पास रह कर ब उस के बाद श्री पारिक सस्कृत महाविद्यालय मेड़ता सिटी में हुआ।उसने नागौर से आईटीआई का प्रशिक्षण प्राप्त कर रोडवेज में सेवा आरंभ की थी।
उसका प्रथम विवाह हीराजसर निवासी जो बीकानेर में बस गए थे मंगल सिंहजी की सुपुत्री के साथ किया गया था।वह पीबीएम चिकित्सक में प्रसव के लिए उसके बड़े भाई श्री रामसिंह जी ने भर्ती कराया।उसका पूरा पीहर पक्ष हैस्पीटल में था मगर वह स्वस्थ बच्चे को जन्म दे कर संसार सागर छोड़ गई।हमारे परिवार की ऐसी परिस्थिति नहीं थी यह सत्य है,मगर उसके नाना ,नानी और मामाओं ने उसका भरण पोषण तो किया ही उसे सुशिक्षित कर उसका विवाह तक भी किया।उसका नाम करण मेरी धा याने माताश्री ने भागी रथ रखा और उसके ननिहाल वालों ने अमित कुमार रखा।वह आज भी दोनों नामों से जाना जाता है।उसकी युवावस्था में विधुर हो जाने के कारण उसके पुनः विवाह के कई प्रस्ताव आए और मेरे कवरजी याने पिताजी ने सहमति दे दी और नारवा पुरोहीतान निवासी जुगल सिंहजी जो टुंकलिया में रहते थे।उनकी पुत्री के साथ विवाह कर दिया।।उसके दो पुत्र आनंदसिंह और दिलीपसिंह तथा पुत्री प्रियंका का जन्म हुआ किंतु लक्ष्मण के अल्प दांपत्य जीवन ही लिखा था।दिलीप के जन्म के साथ ही उसकी पत्नी को बल्ड कैंसर हो गया और वाह भी छोटे छोटे बच्चों को छोड़ कर स्वर्गवासी हो गई जिनका लालन पालन गांव में ही मेरी धा की देख रही में हुआ था। बच्चे छोट थे उसके तीसरे विवाह के कई प्रस्ताव भी आए किंतु बच्चो के साथ विमाता न जाने केसा व्यवहार करेगी।बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए ही उसने तीसरा विवाह नहीं क्या।आनंद को वह बहुत पढ़ाना चाहता था।उसे जोधपुर,ब्यावर और डीडवाना के अच्छे विद्यालयों में भी पढ़ाया था।और मेरा परिवार मंगलसिंहजी के परिवार के ऋणी हैं।
।मै अभी लक्ष्मण के शरीर को पंचतत्व में दाहसंस्कार कर घर लौटा हूं।मैने अब तक अपने दत्तक पिता सबल सिंह जी,दादाजी जोधसिघ जी,छोटी बहन गोमती,दादी जी केशर कवर जी,बड़ी मां मोती कंवर जी,पिता शिवनारायण सिंह जी,छोटे भाई लक्ष्मण की दो पत्नियां मेरी धा याने माताश्री फिर छोटे भाई रामकिशन की पत्नी और 6 मार्च 2019 को मेरी श्रीमती रुक्मा देवी और अब लक्ष्मण की मृत्यु ।क्या ये सभी मेरे परिवार को ही भोगने के लिए ईश्वर ने भेजा था।
दिल रो रहा है।आत्मा कराह रही है , मगर मैं सब से बड़ा हूं।भून भून रोऊंगा तो बाकी का क्या हाल होगा,अंदर ही अंदर घुट रहा हूं। वह मेरा आज्ञाकारी भाई था।उसने कभी अवज्ञा नहीं की थी।
वह मेरे परिवार का स्तंभ था।विवाह शादियों में वही बहन बेटियों को लाने और पहुंचाने का कार्य जिम्मेदारी पूर्वक करता था।परिवार में अधिकाश मृत्यु पर वही हरिद्वार अस्थि विसर्जन के लिए जाता था।वह बहुत धैर्यवान होने के साथ साथ हृदय का विशाल था।कभी भी उसने अपना दुख दर्द किसी के सामने प्रकट नहीं किया।


उसने चार धाम और सातपुरियों की यात्रा खुद अकेले नहीं की थी।वह मेरी धा अर्थात माताश्री को भी विकट परिस्थितियों में यात्रा कराई थी।छोटा बड़ा कोई भी तीर्थ ऐसा नहीं बचा जहा पर उसने धार्मिक यात्रा न की हो।उसके जीवन में उसकी समझ के बाद जितने कुंभ आए वह उन सब में गया था।हरिद्वार तो वह अनेक बार गया था।अयोध्या,काशी,मथुरा और प्रयाग राज से उसके लगाव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने वहा अनेक यात्राएं की थी।
स्वभाव
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सदैव प्रश्न चित रहना।अधिक से अधिक सेवा करना।और कभी भी वह तब तक उधार नहीं लेता था जब तक बहुत बड़ी विपत्ति न आ जाती और जब तक उधार नहीं चूकता तब तक उसे नींद नहीं आती थी। नशे से कोसों दूर था।केवल दो समय कॉफी अवश्य पिता था। बह मिठाई का बहुत शौकीन था।गांव में खुद हलवा बना कर खाता था और वाह भी नित्य। हालात ये थे कि डाक्टरों ने दूध खिचड़ी खाने को कहा मगर वह अड़ गया।हलवा खाऊंगा।भागीरथ ने मुझे फोन लगाया।मैने उसे हलवा खिलाने की छूट दे दी।जब उसने हलवा खाया तभी आत्मिक शांति हुई। वह अफीम से नफरत करता था।वह नास्तिक नहीं था मगर पाखड़ी आस्तिकों से उसे नफरत थी।
उसने सामाजिक सस्थाओं में भी कार्य किया था और निस्पक्षता,निडर रह कर अपनी बात रखी।वाह स्पष्ट वक्ता भी था। चंपा खेड़ी के युवक मंडल का सस्थापक सचिव भी था जो सस्था आप बहुत बड़े वट वृक्ष की तरह गांव में काम कर रही है।वह राजपुरोहित पंचायत भवन में भी कई वर्ष कार्य कर चुका था।
वह रोडवेज में प्रदेश स्तरीय नेता भी था ।उसकी सेवा निवृत्ति 31जुलाई 2018 को रोडवेज जोधपुर से हुई थी।इससे पूर्व वह बीकानेर,सरदार शहर,दिल्ली,उदयपुर,बांसवाड़ा,फालना,नागौर आदि अनेक आगारों में रहा था। रोडवेज कर्मचारियों की समस्याओं के लिए उसने अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया।भूख हड़ताल की ओर जेल भी कई बार गया था।और रोडवेज से लगभग दो साल पहले मुख्य भंडार निरीक्षक पद से सेवा निवृत हुआ था।उस समय उसकी सेवा निवृत्ति पर रोडवेज श्रमिको,रोडवेज संगठन, और एटक के प्रदेश के बाहर तक के नेताओं ने अविस्मरणीय विदाई समारोह किया जैसा बड़े बड़े आई ए एस के भी नहीं होते।यही उसकी सेवा की बहुत बड़ी उपलब्धि और सम्मान था जैसे उसे पद्मश्री मिली है।इससे मेरे परिवार का भी सर गर्व से ऊंचा हुआ।
उसे दुख था तो केवल यही कि रोजवेज में 60 की आयु तक उसने सेवा की उसने पैंशन का विकल्प नहीं लिया था।इसी कारण रोजवेज़ से लगभग 15 से 20 लाख रुपए मिलने थे।उसका दुर्भाग्य रहा कि रोडवेज ने अब तक उसको एक रुपए का भी भुगतान नहीं किया।रोडवेज उसकी जमापूंजी मांगने पर खजाना खाली का रोना रो रही है।उसके तीनों पुत्र बेरोजगार हैं।वह आर्थिक तंगी का शिकार रहा और उसी तंगी में वह चला गया।इसकी जिम्मेदार रोडवेज नहीं तो कौन है।सरकार नहीं तो कौन है। ऐसे कई कर्मचारी अपनी जीवन भर की जमा पूंजी रोडवेज में जमा होते हुए भूखों मर रहे हैं।
एक बार मैने उसे कहा था कि तुम्हारा मंत्री मेरा खास आदमी है।मैने और प्रताप सिंह खाचरियावास ने दिवराला प्रकरण में साथ साथ आंदोलन में काम किया था।मेरे कहने से वह शायद तेरा बकाया भुगतान करा देगा।वाह कुछ देर मौन रहा।मैने वापस कहा तो उसने जबान दिया मेरे साथियों को भुगतान न मिले और मैं भुगतान ले लूं।यह मेरी आत्मा नहीं मानती और मैं भुगतान तभी लूंगा जब मेरे साथियों को भुगतान मिल जायेगा।फिर उसने ही कहा अगर वे आपकी मानते हों तो सब के भुगतान की बात कर के हम लोगों का कल्याण कीजिए।मैने कहा इतनी बड़ी मेरी अप्रोच नहीं है क्योंकि वित्त खुद मुख्यमंत्री गहलोत साहब संभालते हैं।


निवेदन
===उसके लिए कोई भी मित्र,रिश्तेदार,बहन,बहनोई,भानजे, भानजी,बेटी,जंवाई,दोहिते,दोहिती और निकटतम रिश्तेदार,कोई भी और मित्रगण वर्तमान स्थिति में आने का कष्ट न करें।आप अपने निवास स्थान पर ही उसकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से आराधना कीजिए।स्थितियां भयंकर है और मैं नहीं चाहता कि मेरा कोई शुभ चिंतक बीमारी का ग्रास बने।या सरकार के नियमों को तोड़ कर कानून का दोषी बने।
अभी उसकी आत्मा की शांति के लिए उसके एकादसे पर बिना माइक लगाए सुंदरकांड का पात और द्वादसे के दिन गृह शुद्धि,यज्ञ और पाग दस्तूरी की रस्म की जाएगी।
लक्ष्मण का जाना मेरे परिवार की अपूरणीय क्षति है जिसकी जीवन भर किसी भी प्रकार से पूर्ति असंभव है।वह तो अनंत यात्रा पर निकल गया अब रोना धोना हमारे हिस्से में रह गया है।और है कर भी क्या सकते हैं।विगत लगभग हम चारों भाई एक ही छत के नीचे रहे।यही एक उपलब्धि रही जिसके सहारे उसकी छवि दिन भर आखों में रची बसी है।यह एक सुखद संयोग रहा कि वह दो चार दिन से बीमार था तो भागीरथ बीकानेर से गाड़ी ले आया और उसको पीबीएम में भर्ती करवा दिया तब श्री भंवर सिंह भाटी,मंत्री राजस्थान सरकार की सिफारिश और डॉक्टर लखारा ने भागदौड़ कर उसे आईसीयू में भर्ती करा दिया।उसके दो पुत्र जोधपुर में थे वे भी तुरंत बीकानेर पहुंच गए। उसके तीनों पुत्रों ने अंत समय तक उसके पास रह कर सेवा सुश्रुषा का लाभ उठाया।एक डॉक्टर अशोक लखारा की निस्वार्थ सेवा को हम सदेव याद रखेंगे।वह दिर्गायु और यशस्वी हो यही ईश्वर से कामना करता हूं।
ईश्वर ने जीवित रखा और स्थितियां अनुकूल होगी तब कोई कार्यक्रम अवश्य करेंगे और आप सब की उपस्थिति में करेंगे।तब तक के लिय सखेद क्षमा करेंगे।
मेरा परिवार इस प्रकार है।
,1,देवकिशन बड़ा भाई
2,रामकिशन बड़ा भाई
3, लक्ष्मण। स्वर्गवासी।
4, मोहन लाल छोटा भाई
परिवार में 10 पुत्र और 11 पुत्रियां
लक्ष्मण के पुत्र पुत्र पुत्रियां
1,अमित कुमार उर्फ भागीरथ
2, आनंद सिंह
3,दिलीप सिंह
और पुत्री प्रियका उर्फ पिंकी
दो बहनें
1,सुमत कंवर
2, जसोदा कंवर
पौत्र
1,नव उदय
2,चाणक्य प्रसाद
पोती
1,सिमरन
देवकिशन राजपुरोहित
साहित्यकार,
चम्पा खेड़ी
