मौद्रिक नीति की भी सीमा है। सरल मौद्रिक नीति के अंतर्गत रिजर्व बैंक ब्याज दरों को कम कर देता है। रिजर्व बैंक को छूट होती है कि अपने विवेक के अनुसार वह ब्याज दरों को कम करे। इन कम ब्याज दरों पर कमर्शियल बैंक मनचाही रकम को रिज़र्व बैंक से ऋण के रूप में ले सकते हैं। इसके बाद बैंक द्वारा उस रकम को सरकार को अथवा दूसरे उद्योगों को ऋण के रूप में दिया जाता है। लेकिन रिज़र्व बैंक यदि ब्याज दरों को शून्य भी कर दे तो भी जरूरी नहीं कि कमर्शियल बैंक रकम को लेकर उद्योगों को देने में सफल होंगे।
अगला विकल्प नोट छापना | नोट छापने की भी सीमा है। यदि नोट छापने मात्र से आर्थिक विकास हो सकता होता तो जवाहरलाल नेहरू के समय ही रिज़र्व बैंक ने भारी मात्रा में नोट छापकर आर्थिक विकास हासिल कर लिया होता। जब भी अधिक मात्रा में नोट छापे जाते हैं तो बाजार में मूल्य बढ़ने लगते हैं। बड़ी मुद्रा का प्रचलन महंगाई में वृद्धि करता है |
यही कारण है कि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के समय जर्मनी में एक डबल रोटी को खरीदने के लिए लोगों को लाखों मार्क ले जाने पड़ते थे। तात्पर्य यह कि मौद्रिक नीति से अर्थव्यवस्था को बढ़ाना थोड़े समय के लिए संभव होता है जब तक महंगाई न बढ़े। जब नोट छापने से महंगाई बढ़ने लगती है तो यह नीति पूरी तरह फेल हो जाती है।
कोरोना संकट का सामना करने के लिए हमें अर्थव्यवस्था को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट देना चाहिए | हर राज्य को उसके संसाधन और मानव शक्ति के मध्य तालमेल बैठाने के लिए स्वतन्त्रता पूर्वक योजना बनाने और राज्य में उपलब्ध मानव शक्ति को कार्य देने की स्वतंत्रता देनी चाहिए |