
_जीवन में प्रज्ञा का जागरण जरूरी-
बीकानेर। प्रज्ञा का जागरण सम्यक ज्ञान की तीसरी देन है। हम सब के पास प्रज्ञा है, लेकिन वह सोई हुई है। प्रज्ञा जागृत होनी चाहिए। इससे ही जीव -अजीव, पुण्य-पा और धर्म-अधर्म की पहचान होती है। हमारे पास प्रज्ञा तो है लेकिन जरूरत उसे जागृत करने की है। यह सद्विचार श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के 1008 आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब ने अपने नित्य प्रवचन में व्यक्त किए। सेठ धनराज ढ़ढ्ढा की कोटड़ी में आचार्य श्री का चातुर्मास चल रहा है। जहां आचार्य श्री विजयराजजी महाराज साहब ने रविवार को प्रज्ञा का जागरण विषय पर व्याख्यान दिया।
आचार्य श्री ने बताया कि जिन्हें प्रज्ञा का ज्ञान हो जाता है, उसे सम्यक ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। जिनकी प्रज्ञा जागृत नहीं होती, उनके लिए यह शास्त्र, ग्रन्थ, आगम किस काम के, नीतिकार कहते हैं कि जिनकी आंखे नहीं उन्हें कितने ही दर्पण दिखाओ बंधुओं, उनके लिए आइना किस काम का है। सब जागरण, सत्संग प्रज्ञा के लिए ही किए जाते हैं। इसलिए थोड़ा चिंतन हमें करना चाहिए कि हमें प्रज्ञा का जागरण हुआ या नहीं हुआ है।
आचार्य श्री ने कहा कि जो ज्ञानी होता है, वह सबकुछ जानता है। अज्ञानी कुछ नहीं जानता, जो जीव- अजीव को नहीं जानता, वह संयम को क्या जान पाएगा। थोड़ा सा हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमें जीव-अजीव की पहचान हो, अगर यह नहीं हुआ तो बंधुओं- हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही चले जाएंगे।
_पाप की रूची को घटाओ
महाराज साहब ने कहा कि एक श्रावक ने संतों से पूछा -पाप जीवन में घट नहीं रहे, क्या करें..?,संतों ने कहा पाप नहीं घट रहा तो कोई बात नहीं, पाप की रूची को घटाओ। पाप करना भी पड़े तो रोते-रोते करो, हंसते-हंसते करोगे तो पाप मजबूत हो जाएगा। यह याद रखो, हमें पाप से बचना है तो पाप को मजबूत नहीं करना है। आचार्य श्री ने कहा कि अनिकाचित कर्म को तो परिवर्तन किया जा सकता है, वर्तमान में यह शक्ति है लेकिन पाप निकाचित कर्म कहलाता है। इसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता। यह शक्ति वर्तमान में नहीं है। इसमें परिवर्तन संभव ही नहीं है। क्योंकि यह कर्मवाद के सिद्धान्त पर चलता है, यह संभव हो जाता है तो कर्मवाद ही समाप्त हो जाता है, लेकिन कर्मवाद बलवान है।
पाप को भोगना आसान, बांधना कठिन
आचार्य श्री ने बताया कि जीव जैसा कर्म करता है और जिस इन्द्रिय से कर्म करता है, उस इन्द्रिय को उसका फल भोगना ही पड़ता है। इसलिए अशुभ कर्म के बंध से बचना चाहिए। माहाराज साहब ने कहा कि बंधुओ- पुण्य को खपाने में देर नहीं लगती लेकिन पाप को खपाने में बहुत समय लगता है। पाप को भोगना आसान है, लेकिन बांधना बहुत कठिन है। पुण्य हमें मिलता है लेकिन हम इसे मौज-शौक- मनोरंजन और मस्ती में लुटा देते हैं। बंधुओ- पुण्य बचाओ, इसे बचाएंगे तो आपको यश, प्रेम, आदर, सम्मान और जो चाहोगे वह मिलेगा केवल पुण्य की बदौलत ही यह हासिल किया जा सकता है।
समागम से बनती सुबुद्धी
सत्संग, समागम कुबुद्धी को सुबुद्धी बनाता है। आपकी प्रज्ञा जागृत है तो व्यक्ति का जीवन पवित्र-पावन बन जाता है। महान बन जाता है। इसलिए प्रज्ञा का जागरण जरूरी है। प्रज्ञा के जागरण से आसक्ति,ममता के भाव कम होने लगते हैं। जिस दिन यह समझ आ जाता है, उस दिन उसे जीव-अजीव की पहचान हो जाती है। लेकिन हम बड़े तो हो गए हैं परन्तु जीव-अजीव की पहचान हमें नहीं हो रही है। इसलिए सत्यग्राही बनें, मूर्खता, अज्ञानता यह प्रज्ञा के सुप्त होने पर होती है। अपनी प्रज्ञा को जगाओ।
जिंदगी में हजारों से मेला जुड़ा….
जिंदगी में हजारों से मेला जुड़ा, हंस जब-जब उड़ा वो अकेला उड़ा, संगी-साथी ना कोई साथ चला, हंस जब-जब….. भजन की प्रेरक पंक्तियों के माध्यम से महाराज साहब ने बताया कि जब तक सांस है, तब तक ही परिचय और पहचान रहती है। जिस दिन सांस निकल जाती है, उस दिन जीवन को छोड़ अकेला ही जाना पड़ता है। इसलिए संगी-साथी, धन- ऐश्वर्य, मैं- मेरा का अभिमान नहीं करना चाहिए। यह सब यहीं के यहीं रह जाते हैं। जाता है तो जीव और उसके कर्म जो उसने किए हैं।
_ संघ ने किया अतिथियों का स्वागत
श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष विजयकुमार लोढ़ा ने बताया कि रविवार को उदयपुर संघ के श्रावक-श्राविकाओं ने आचार्य श्री के दर्शन लाभ लिए और जिनवाणी का श्रवण किया। संघ के श्रावक-श्राविकाओं ने जप-तप-ध्यान किए, तपस्याओं का क्रम जारी है।