जयपुर, 14 जुलाई 2026 । सड़क पर एक बुजुर्ग अचेत पड़े थे। न वे बोल पा रहे थे, न अपना नाम बता पा रहे थे। उनके साथ कोई परिजन भी नहीं था। राहगीरों और पुलिसकर्मियों के लिए वे सिर्फ एक अज्ञात व्यक्ति थे, लेकिन समय के खिलाफ चल रही इस जंग में उनकी हर सांस की कीमत थी। मानवता, पुलिस की तत्परता और चिकित्सकों के समय पर लिए गए निर्णय ने आखिरकार उन्हें नया जीवन दे दिया।

जवाहर सर्किल क्षेत्र में लगभग 70 वर्षीय यह वृद्ध सड़क किनारे अचेत अवस्था में मिले। सूचना मिलते ही पुलिसकर्मी उन्हें तत्काल फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर की इमरजेंसी में लेकर पहुंचे। उस समय उनकी स्थिति ऐसी थी कि वे न बोल पा रहे थे, न अपनी पहचान बता पा रहे थे। किसी को यह भी नहीं पता था कि वे कौन हैं और उनके परिजन कहां हैं। इसके बावजूद अस्पताल की टीम ने एक पल भी गंवाए बिना उपचार शुरू कर दिया।

अस्पताल पहुंचते ही इमरजेंसी एवं न्यूरोलॉजी टीम ने ‘स्ट्रोक कोड’ (Stroke Code) सक्रिय किया। बीतते समय के साथ जीवन बचाने का संघर्ष शुरू हो चुका था, क्योंकि स्ट्रोक के प्रत्येक मिनट के साथ मस्तिष्क की लाखों कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। तत्काल क्लिनिकल टेस्ट, ब्रेन इमेजिंग और आवश्यक जांचें की गईं। जांच में पता चला कि वृद्ध एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक (Acute Ischemic Stroke) से पीड़ित हैं। राहत की बात यह थी कि वे उपचार की सबसे महत्वपूर्ण समय-सीमा, यानी गोल्डन आवर, के भीतर ही अस्पताल पहुंचा दिये गये थे।

न्यूरोलॉजी टीम ने बिना किसी देरी के उन्हें इंट्रावेनस थ्रोम्बोलाइसिस (IV Thrombolysis) दिया। इसके बाद धीरे-धीरे चमत्कार जैसा बदलाव दिखाई देने लगा। कुछ समय पहले तक जो बुजुर्ग अपनी पहचान तक नहीं बता पा रहे थे, उनकी बोली लौटने लगी। उन्होंने अपना नाम-पता बताया और अस्पताल प्रबंधन को उनके परिजनों तक पहुंचने का रास्ता मिल गया। अपने परिजन को स्वस्थ देखकर परिवार की आंखों में राहत और खुशी के आंसू थे; उनके लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।

डॉ. नीतू रामरखियानी, डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी, फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर ने कहा, “स्ट्रोक में ‘टाइम इज़ ब्रेन’ केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सत्य है। उपचार में हर मिनट की देरी मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है। इस मरीज का समय पर अस्पताल पहुंचना और गोल्डन आवर के भीतर थ्रोम्बोलाइसिस मिलना उसकी जिंदगी बचाने में निर्णायक साबित हुआ।”

डॉ. मनीष कुमार अग्रवाल, डायरेक्टर, फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर ने कहा, “जब वृद्ध को अस्पताल लाया गया तब उसकी पहचान तक उपलब्ध नहीं थी। लेकिन आपातकालीन चिकित्सा में मरीज का जीवन सर्वोपरि होता है। हमारी टीम ने बिना किसी औपचारिकता या देरी के तत्काल उपचार शुरू किया। पुलिस की त्वरित कार्रवाई और डॉक्टरों के समय पर निर्णय ने मिलकर एक जीवन बचाया है।”

यह घटना सिर्फ एक सफल चिकित्सा उपचार की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि जब संवेदनशील पुलिसकर्मी, समर्पित डॉक्टर और समय पर चिकित्सा एक साथ प्रयास करते हैं, तो किसी की भी जिंदगी बचाई जा सकती है। कुछ घंटे पहले तक जो बुजुर्ग अपनी पहचान खो चुके थे, वे आज अपने परिवार के बीच स्वस्थ हैं—क्योंकि किसी ने समय रहते उनकी मदद करने का निर्णय लिया।

फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर आमजन से अपील करता है कि यदि किसी व्यक्ति में अचानक चेहरे का एक तरफ टेढ़ा होना, हाथ या पैर में कमजोरी या सुन्नपन, बोलने या समझने में कठिनाई, संतुलन बिगड़ना अथवा अचानक बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे स्ट्रोक का संकेत मानते हुए बिना किसी देरी के मरीज को स्ट्रोक उपचार सुविधा वाले अस्पताल पहुंचाएं।