कल अर्थात दो दिसम्बर और तीन दिसम्बर की आधी रात को गैस त्रासदी को ३५ बरस बीत जायेंगे | उस रात जिन के परिजन, मित्र, रिश्तेदार इस त्रासदी की भेंट चढ गये वे तो शोक संतप्त है ही पर गैस के प्रभाव में आने के बाद जो उस दिन बच गये वे ज्यादा दुखी हैं | बीमारी ठीक होने का नाम नहीं लेती, मुआवजा वसूलने का अधिकार सरकार के पास है, गैस पीड़ितों के इलाज़ के नाम पर बनाये गये अस्पताल डाक्टरों की कमी के कारण दम तोड़ रहे हैं | प्रदेश के दोनों बड़े राजनीतिक दलों के बड़े नाम, अपने हित साध कर चुप हैं |उस रात उभरे संघर्ष सन्गठन और मोर्चे आपसी संघर्ष की धींगामस्ती में लगे हैं | एक दूसरे को नीचा दिखने की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं | हर साल की तरह सेंट्रल लायब्रेरी के मैदान में मजिलस-ए- मातम होगा, मर्सिये पढ़े जायेंगे, सरकार हमेशा की तरह ख्वाब-ए-सुखन दिखाएगी और गैस पीड़ित अगले साल तक अपनी मौत का इंतजार करेंगे, क्योंकि मुआवजा जैसी चीज तो भारत सरकार की तिजोरी में हैं |
एक अन्य सन्गठन ने उसके पास १९९४ -९५ के दस्तावेजहोने का दावा किया है ये दस्तावेज बताते हैं कि गैस पीड़ितों के ७० हजार बच्चों की जांच हुई थी । जिनमे से २४३५ बच्चों में दिल की जन्मजात विकृतियां पाई गईं हैं। दस्तावेज बताते हैं कि इनमें से सिर्फ १८ बच्चों को प्रदेश सरकार से मदद मिली, बाकी बच्चों का क्या हुआ? आईसीएमआर और प्रदेश सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। सरकारें जव्बाब कहाँ देती है ?
मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार के मुख्यमंत्री जब केंद्र में पर्यावरण विभाग के मंत्री थे तब उन्होंने गैस पीड़ितों से जो वायदे किये थे उस पर अब कुछ करें तो यह गैस पीड़ितों की मदद होगी | प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से दोस्ती का दम भरते हैं, तो भगौड़े यूका प्रबन्धन को अदालत के सामने हाजिर कराएँ | यह सब न कर सकें, तो दोनों मिलकर उस पैसे को गैस पीड़ितों में बंटवा दे जो खजाने में जमा है |
उस रात जो दुनिया से चले गये उन्हें नमन, जो कष्ट में हैं, उनके लिए प्रार्थना और केवल मर्सिये गाने वालों के लिए लानत |